तबलीगी जमातियों की आपबीती, अस्पताल के नाम पर जेल पहुंचा दिया, फोन ज़ब्त कर लिया, परिवार से…

देश में कोरोना वायरस महामा’री के बीच मार्च में दिल्ली में तबलीगी जमात से जुड़े 29 विदेशी नागरिकों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने हाल ही में रद्द कर दिया है. इस फैसले के बाद जमात में शामिल हुए यह लोग अपने देश वापस लौटने के लिए जब्त पासपोर्ट दोबारा करने करने के लिए ट्रायल कोर्ट से संपर्क करेंगे. इन विदेशी नागरिकों में आइवरी कोस्ट, तंजानिया, ईरान, जिबूती और घाना जैसे देशों के लोग शामिल हैं.

वहीं यह लोग जेल से रिहा होने के बाद जून से ही अहमदनगर में स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए आवास में रहने को मजबूर हैं. इनमें से कई नागरिक दो महीने तक जेल में रहे हैं.

कोर्ट में विदेशी नागरिकों ने बताया कि वो भारत में इस्लाम धर्म का अध्ययन करने के उद्देश्य से 10 मार्च से पहले एक धार्मिक समूह में शामिल होने के लिए पहुंचे थे. इन लोगों ने बताया कि उन्होंने अपनी यात्रा को लेकर स्थानीय अधिकारियों सहित पुलिस प्रशासन को भी जानकारी प्रदान की थी.

इसी बीच दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के लोगों का इकट्ठा होना का मामला सामने आया था. जिसके बाद महाराष्ट्र पुलिस ने 29 विदेशी नागरिकों सहित कई अन्य के खिलाफ भी केस दायर कर लिए थे.

पुलिस के मुताबिक यह लोग इस्लाम का प्रचार कर रहे थे जो वीजा और लॉकडाउन दिशा-निर्देशों का सीधे तौर पर उल्लंघन था. इस मामले में इन विदेशी नागरिकों के खिलाफ महामारी, विदेशी एक्ट और आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मामले दर्ज किये गए थे. जिन्हें अब कोर्ट ने रद्द कर दिये हैं.

विदेशी नागरिकों में शामिल 50 वर्षीय मेन्सा इस्माइल यूसुफ ने बताया कि वो घाना में एक छोटे व्यापारी हैं. वो 30 मार्च को अहमदनगर की एक मस्जिद में ठहरे हुए थे तभी हमसे स्थानीय अधिकारियों ने संपर्क साधा था. हमें दो सप्ताह से अधिक समय तक क्वारंटाइन सेंटरों में रखा गया था.

इसके बाद 17 अप्रैल को अधिकारी वापस आए और उनके फोन व पासपोर्ट ले लिए और हमें जेल में डाल दिया गया. 17 जून को रिहा हुए युफूफ़ ने बताया कि हम अपने परिवार से संपर्क नहीं कर सके. हमें यह तक नहीं बताया गया कि हमारे खिलाफ केस क्यों दर्ज किया गया हैं.

उन्होंने कहा कि हमारे फोन अधिकारियों के पास थे. उन्होंने हमें हॉस्पिटल में टेस्ट कराने चलना पड़ेगा ऐसा बोलकर जेल में डाल दिया. हम अपने परिवारों को जानकारी तक नहीं दे सके. हमने जेल अधिकारियों से खूब गुजारिश की कि वो परिवार के सदस्यों से बात करा दें लेकिन उन्होंने हमें अनुमति नहीं दी.