बाढ़-महामारी जैसे गंभीर मुद्दों को साइड में फेंक, गिद्धों की तरह रिया पर टूट पड़े मीडिया के एंकर

सुशांत सिंह राजपूत के केस को भारत के इतिहास का शायद सबसे खतर’नाक और खौफनाक केस के रूप में दिखाया जा रहा हैं. यह बेहद अद्भुत और एकमात्र ऐसा मामला हैं जिसके आगे बाढ़ और देश में फ़ैल रही महामारी कोरोना भी छोटे साबित हो रहे हैं. जांच प्रक्रिया का यह गजब उदाहरण हैं जहां मीडिया के लोग भारत की अन्य महत्वपूर्ण खबरों को छोड़कर, गिद्धों के झुंड की तरह एक आरोपी पर टूट पड़े हैं.

राजपूत के आ’त्मह’त्या मामले में खौफनाक मॉब लिं’चिंग का विस्तार तक कर डाला हैं जबकि यह अब तक कुछ लफंगे समूहों तक सीमित थी. लेकिन अब सभ्य समाज भी इसमें शामिल हो चूका हैं. सभ्य समाज की खास बात यह होती हैं वो कभी डंडा या चप्पल लेकर नहीं निकलता हैं.

बल्कि वो अंदर भरे जगह को भी एक दम सभ्य रास्ते से ही निकलता हैं. वो कभी लिंचिं’ग के आरोपियों को माला पहनाता है तो कभी संगसारी का समर्थन करता है और उसका मानना होता हैं कि दं’गे राष्ट्र की सेवा है.

आपको ऐसे चैनलों से डरने की जरूत हैं जो एक आरोपी युवती को खुले शब्दों में ह’त्यारिन लिख सकता है, जबकि यह हर तरीके से गैरकानूनी हैं. अभी तक तो एजेंसी ने भी तय नहीं किया हैं कि आरोपी पर आ’त्मह’त्या के लिए उकसाने का आरोप बनेगा या ह’त्या का, या फिर वो निर्देश हैं, यह सब तो ट्रायल से पहले कोर्ट भी नहीं कह पाती हैं.

लेकिन भविष्यज्ञाता बनी मीडिया को लगता हैं सबकुछ पता हैं. रिया चक्रवर्ती से शक के आधार घृणा करने वाले लोग उन्हें सलाह दे रहे हैं कि तुम भी म’र क्यों नहीं जाती, तुम्हे भी सुसा;इड कर लेना चाहिए, तुम्हे रोक कौन रहा हैं?, सुसाइड लेटर छोड़ना मत भूलना. ऐसी बातें लिखने वाले लोगों के बारे में क्या कहा जाए?

क्या ये लोग सच में न्याय चाहने वाले लग रहे हैं? अगर आप लोकतंत्र की न्यायिक प्रक्रिया की थोड़ी सी भी या जरनल जानकारी भी रखते हैं तो भारतीय मीडिया का इस मामले पर कवरेज देखकर आप हर जाएंगे. अगर आप नहीं ड’र रहे हैं तो आपको डर’ने की जरूरत हैं.

रिया के बचाव का कोई कारण नहीं हैं लेकिन उसे निर्दोष ठहराने का भी कोई ठोस कारण मौजूद नहीं हैं. लेकिन इसके बाद भी मीडिया और कथित सभ्य समाज का एक बड़ा हिस्सा मिलकर किसी को भी दोषी ठहरा रहा हैं, यहां तक की उसके म’रने की कामना तक कर रहा हैं.

साभार- बोलता हिंदुस्तान