VIDEO: बिकाऊ मीडिया ने पुरानी कब्रिस्तान की तस्वीर दिखाकर एक बार फिर देश के लोगों को गुमराह किया

भारतीय मीडिया में खबरों की विश्व’सनीय’ता लगातार कम होती जा रही है. बड़े-बड़े मीडिया हाउसेस भी गलत और झू’ठी खबरों का प्रसारण करने में पीछे नही रह रहे है. पहले जहां अफवा’ह और फे’क न्यूज़ सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जाती है, आज वहीं काम खुद मीडिया कर रहा है. मीडिया अपने आ’काओं के दावों को सच बताने के लिए किसी भी फेक न्यूज़ का सहारा लेने में नहीं कतराते हैं. हाल ही में चीन और भारतीय सैनिकों के बीच गलवान घाटी में झड़’प हो गई थी.

15 जून को हुई इस झड़’प के दौरान भारतीय सेना के 20 जवान शही’द हो गए थे. वहीं दूसरी ओर चीनी सरकार की तरफ से मृ’तकों की संख्या को लेकर कोई साफ आंकड़ा सामने नहीं आया था जिसके चलते मीडिया द्वारा लगातार ग़लत जानकारियां फैलाई जा रही थी. अफवा’हों के तहत पीएलए के करीब 5 से 100 के बीच जवान मा’रे गए हैं ऐसा बताया जा रहा हैं.

 

इसी बीच गिरती जीडीपी को लेकर सामने आए है’रान करने वाले आंकड़ों को दबा’ने के लिए गोदी मीडिया ने दर्शकों का ध्यान दूसरी तरह खींच दिया. मीडिया ने एक चीनी कब्रि’स्ता’न की तस्वीर उठाकर उसे दिखाना शुरू कर दिया.

इस तस्वीर को दिखाते हुए मीडिया ने दावा किया कि ये क’ब्रें भारतीय सैनिकों के हा’थों गलवान घाटी में मा’रे गए चीनी सैनिकों की है. न्यूज़ चैनल आजतक ने 31 अगस्त को दावा करते हुए खबर चलाई कि उसके पास एक्स’क्लू’ज़िव तस्वीरें हैं जो साबित करती हैं कि गलवान घाटी में 40 चीनी सैनिक मा’ गए थे.

इसी तरह के दावे करते हुए यह खबरें इंडिया टूडे ने भी दिखाई और क’ब्रों की तस्वीरों को सैटलाइट द्वारा ली गई तस्वीर बताया. वहीं टाइम्स नाउ ने दावा करते हुए चीनी सेना की 106 क’ब्रें गिना डाली. इसी तरह स्वराज न्यूज़ और कई बीजेपी नेताओं ने भी इस खबर को अपने ऑफिसियल ट्वीटर हैडल से शेयर किया.

 

सच क्या है?

असल में मीडिया और बीजेपी नेताओं द्वारा किया जा रहा यह दावा एक कोरा झू’ठ हैं. संभव है कि यह झू’ठ मीडिया ने जीडीपी और बेरोजगा’री पर चल रही बहस से लोगों का ध्या’न भट’का’ने के लिए यो’जनाब’द्ध तरीके से फैलाया हो. असल में यह क्र’बें वर्षों पुरानी है.

तस्वीर में कांग’क्सि’वा में मौजूद चीनी सैनिक कब्रि’स्तान नजर आ रहा है, जहां 1962 के भारत-चीन यु’द्ध में शही’द होने वाले पीएलए सैनिकों की क’ब्र मौजूद हैं. मीडिया द्वारा अपने झूठ को सच बताने के लिए 2011 की सैटेलाइट इमेज इस्तेमाल की जा रही हैं.