संसद का मॉनसून सत्रः लॉकडाउन के चलते कितने प्रवासी मजदूरों की गई जा’न? केंद्र ने दिया यह जवाब

कोरोना वायरस के बचाव के उद्देश्य के साथ लागू किये गए लॉकडाउन से सबसे ज्यादा परेशानी उठाने वाले प्रवासी मजदूरों को केंद्र सरकार किस हद तक नजरअंदाज कर रही है? इसका जबाव आज केंद्र सरकार की तरफ से संसद में दिये गए बयान में साफ झलक रहा है. केंद्र सरकार के बिना योजना बनाए लगाए गए लंबे लॉकडाउन ने प्रवासी श्रमि’कों से अचानक ही उनका रोजगार छी’न लिया. जिसके चलते वो भू’खे रहने को मजबूर हो गए.

बेरोजगारी और भुखम’री ने उन्हें वापस अपने घरों की तरफ लौटने पर विवश कर दिया. इसके बाद हजारों की तादात में मजदूरों ने पैदल ही अपने-अपने राज्य और शहरों की तरफ जाना शुरू कर दिया और इस दौरान कई मजदूरों ने अपनी जा’न भी गवां दी.

लेकिन केंद्र की सत्ता में बैठी नरेंद्र मोदी की सरकार को शायद इसकी कोई जानकारी ही नहीं है? दरअसल आज संसद के मॉनसून सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में प्रवासी मजदूरों के मामले को उठाया गया और सरकार से सवाल भी पूछे गए हैं.

सरकार से पूछा गया कि म’हामारी के चलते देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के बीच कितने प्रवासी मजदूरों ने अपनी जा’न गवाई? लेकिन केंद्र सरकार के पास इसका आंकड़ा मौजूद ही नहीं है.

केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने लोकसभा में पूछे गए सवाल पर बताया कि कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए 68 दिन के लॉकडाउन में कितने प्रवासी श्रमिकों की जा’न गई इसका सरकार के पास कोई डेटा नहीं है. सरकार ने जब पूछा गया कि क्या सरकार ने पीड़ित परिवारों के लिए कोई मुआवजा या आर्थिक सहायता प्रदान की है.

तब इस पर मंत्रालय ने कहा कि चूंकि सरकार के पास इस तरह का कोई डेटा ही नहीं है, इसलिए पीड़ितों के परिजनों को मुआवजा देने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

वहीं इससे पहले केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र के दौरान प्रश्नकाल एवं गैर सरकारी कामकाज के निलंबन से जुड़े प्रस्ताव को कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों के भारी विरोध के बीच लोकसभा में रखा और इसे मंजूरी प्रदान कर दी गई. विपक्षी दलों ने सत्र से प्रश्नकाल के निलंबन को विपक्ष की आवाज़ दबाने का प्रयास करार दिया.