कोरोना काल में अब रेलवे सेक्टर बर्बादी के कगार पर, पत्रकार बोले- नून रोटी खाइए ओर मंदिर का घण्टा बजाइए

दुनिया में फैले कोरोना वायरस ने भारतीय रेलवे के पहिये थमा दिये है. कुछ महीनों पहले तक जो भारतीय रेलवे ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर यानी करीब ढाई करोड़ यात्रियों को रोजना उनकी मंजिलों तक पहुंचती थी वो आज लॉकडाउन के चलते खड़ी हुई है. हालांकि अभी कुछ समय से कुछ स्पेशल ट्रेनों पटरी पर उतर आई है. लेकिन इसके बाद भी भारतीय रेलवे को अरबों का नुकसान उठाना पड़ रहा है, हालत यह हो चुकी हैं कि रेलवे के पास अब पैसा ही नहीं बचा हैं.

असल में सिर्फ लॉकडाउन ही नहीं बल्कि मोदी सरकार की निजीकरण जैसी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार है. जिस रेलवे को देश का सबसे बड़ा रोजगार क्षेत्र कहा जाता था वो आज आर्थिक तं’गी का सामना कर रहा है. रेलवे पिछले काफी समय घाटे में ही दौड़ रही हैं.

आज हालात ऐसे आ चुके है कि रेलवे के पास अपने पूर्व कर्मचारियों एवं अधिकारियों को पेंशन देने के लिए भी पैसे नहीं बचे है. एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार रेल मंत्रालय ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय से वित्तीय सहायता के लिए गुहार लगाई है ताकि चालू वित्त वर्ष में सभी रिटायर हुए व्यक्तियों को पेंशन दी जा सके.

इस मामले को लेकर पत्रकार गिरीश मालवीय ने अपने लेख में लिखा कि रेलवे के 15 लाख रिटायर कर्मचारियों को पेंशन देने के लिए रेलवे बोर्ड को हर साल 53,000 करोड़ रुपये की जरूरत होती हैं लेकिन यह उनके पास नहीं है, इसलिए इस साल कर्मचारियों को पेंशन मिल पाना मुश्किल नजर आ रहा है.

बताया जा रहा है कि यह मुश्किल कोरोना सं’कट की वजह से आ रही हैं लेकिन अगर आप कल छपी खबर पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में भी पेंशन फंड के 53,000 करोड़ रुपये पूरी तरह से अदा नहीं किये गए थे.

इस फंड में करीब 28,000 करोड़ रुपये का निगेटिव क्लोजिंग बैलेंस पहले से था लेकिन अब कोरोना के चलते स्थिति ओर भी बिगड़ गई है. वैसे भी जितने रेलवे के जीतने फायदेमंद रुट है जिनके दम पर रेलवे अपना खर्चा चलाता था उन पर तो प्राइवेट ट्रेंन चलाने की अनुमति दे दी गई है तो अब खर्चा निकलना तो वैसे ही मुश्किल है.

असल में रेलवे को BSNL की लाइन पर धकेला जा रहा है. रेलवे के लिए भी BSNL के कर्मचारी जैसे स्वेच्छिक़ सेवानिवृत्त होने की योजना जल्द आने वाली है, लेकिन पैसे मिलना तब भी मुश्किल है इसलिए अब BSNL जैसे ही रेलवे की बेशकीमती जमीनो को ठिकाने लगाया जा रहा है.

गिरीश मालवीय आगे लिखते है कि जब बीएसएनएल के जैसे रेलवे के भी निगमीकरण की कोशिश चल रही थी तब भी रेलवे के कर्मचारी नहीं समझे और खुलकर मोदी सरकार को उन्होंने मंदिर बनाने के लिए वोट किया और मंदिर तो बन रहा है, अब पेंशन मिले न मिले उन्हें फर्क ही क्या पड़ता है, नून रोटी खाइए ओर मंदिर का घण्टा बजाइए.