इस मुस्लिम युवा ने अपनी मेहनत और लग्न से रचा इतिहास, पिता की मर्जी के खिलाफ की थी पढाई

मंजिल उनको मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता मेरे दोस्त हौसलों से उड़ान होती है. मंजिल तक पहुंचने के लिए हौसला देने वाली यह लाइन आपने पहले कहीं न कहीं सुनी ही होगी. लेकिन आज हम एक ऐसे शख्स के बारे में बात करने जा रहे है जिन्होंने इन लाइन को अपने जीवन में उतार कर अपने सपनों को साकार किया है. कई कठिनाइयों चुनौतियों का सामना करते हुए इस लड़के ने अपने सपनों को हकीकत के पंख लगा दिए है.

आज हम आपको बताने जा रहे है अंसार शेख के बारे में जिन्होंने एक छोटे से गांव से निकल कर देश के सबसे युवा आईएएस ऑफिसर बनने का गौरव हासिल किया. अंसार शेख का जन्म मराठवाड़ा के शेलगांव में हुआ था और यही से उनके संघर्ष की कहानी शुरू हो जाती है. उनके पिता ऑटो रिक्शा चलाते थे जबकि माँ खेतिहर मजदूर थी.

अंसार बचपन से ही दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हुए बड़े हुए. एक सूखाग्रस्त इलाके से होने के कारण गांव में खेती भी ठीक से नहीं हो पाती थी. वहीं गांव में ज्यादातर लोग शराब के शौक में डूबे हुए थे. जहां तक कि अंसार के पिता भी हर रोज शराब का सेवन कर देर रात घर आते और गाली-गलौच करते थे.

इन हालातों के बीच पले-बढ़े अंसार ने छोटी उम्र से ही शिक्षा के महत्व को पहचान लिया था. लेकिन उनकी परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ऐसे में कई लोगों ने उनके पिता को उनकी पढाई छुडवाकर कोई काम-धंधा कराने की सलाह दी. उस समय को याद करते हुए अंसार कहते है कि मैं चौथी कक्षा में था तब मेरे पिता और रिश्तेदारों ने मुझ पर पढ़ाई छोड़ने का दबाव डाला.

जब अंसार नहीं माने तो उनकी पढाई बंद कराने के लिए पिता ने शिक्षक से संपर्क किया तो उन्होंने अंसार के पिता को बहुत समझाया कि आपका बच्चा होनहार है और यह कुछ बड़ा करके दिखाएगा. इसके बाद अंसार के पिता ने उन्हें पढ़ाई-लिखाई के बारे में कहना छोड़ दिया.

इसी के साथ वह अपनी पढाई में मजबूती से जुट गए. वह जिला परिषद के स्कूल में पढ़ते थे और मिड डे मील ही उनकी भूख मिटाने का जरिया था लेकिन यहाँ भोजन में अक्सर उन्हें कीड़े मिलते थे लेकिन फिर भी उन्हें भूख मिटाने के लिए उस भोजन का ही सहारा लेना पड़ता था. इन परिस्थितियों में उन्होंने बारहवीं में 91 फीसदी अंक हासिल करके सफलता का पहला मुकाम हासिल किया.

पिछड़े माहौल में रहने और मराठी माध्यम से पढ़ाई करने के चलते उनकी सबसे बड़ी कमजोरी अंग्रेजी थी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. परिवार की मदद से उन्होंने पुणे के नामचीन फर्गुसन कॉलेज में दाखिला हासिल किया. यहां उन्हें कॉलेज के पहले ही साल यूपीएससी परीक्षा के बारे में जानकारी प्राप्त हुई.

इसके बाद उन्होंने इसे ही अपना लक्ष्य बना लिया और पूरी मेहनत के साथ अपने लक्ष्य को पाने में जुट गए. इसके बाद 2015 में घोषित हुआ रिजल्ट उनकी मेहनत और लग्न का साक्षी बना. इसके साथ ही उन्होंने सिर्फ 21 वर्ष की उम्र में अपने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल करके देश के करोड़ों युवाओं के सामने एक उदाहण पेश किया.