करोड़ों की संपति खड़ी करके इस युवक ने दिव्यगों को कमजोर समझने वालों के मुंह पर मारा करारा थप्पड़

ऐसा कौन कहता है कि आप क्या बिना पैरों के खेल नहीं सकते हो? या फिर डांस नही कर सकते हो? या फिर एक सफल उद्यमी नहीं बन सकते हो? अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक संपूर्ण शरीर की नहीं बल्कि आत्मविश्वास, सही रणनीति और ढेर सारे जूनून की जरूरत होती है. आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे है जिनका व्यक्तिव प्रेरणाओं से भरा हुआ है. जिन्होंने साबित किया है कि परिस्थितियों से हार कर अपने सपनों को दफन नहीं किया जाता हैं.

हम बात कर रहे है गुजरात के सूरत में रहने वाले कल्पेश चौधरी नाम के सफल उद्यमी के बारे में जिन्होंने कठिन स्थिति और विकलांगता को करारी मात देकर अपने सपनों को हासिल कर उन्हें हकीकत में बदला है. आज कल्पेश की कारोबार जगत में अपनी पहचान है. लेकिन इतने ऊँचे शिखर तक पहुंचने के लिए उन्होंने बचपन से ही अनगिनत रुकावटों का सामना किया है.

कल्पेश ने एक लम्बी बीमारी का सामना किया और जब वह सिर्फ 5 महीने के थे. महीनों तक बिस्तर पर बीमारी से लड़’ने वाले कल्पेश इसी दौरान पोलियो का शिकार हो गए. लंबे समय तक बीमारी से बीमारी से ग्रसित रहने के कारण उनका शरीर जर्जर हो चूका था और फिर पोलियो ने तो उन्हें पूरी तरह से जकड़ लिया.

दुर्भाग्यवश कल्पेश को छोटीसी ही उम्र में अपना एक पैर गंवाना पड़ा. पोलियो ने कल्पेश के चलने फिरने की क्षमता छीन ली लेकिन उनके हौसले को छिनने में असफल रहा. बचपन से ही दिव्यांग कल्पेश अपने सामने आने वाली चुनौतियों से लड़ने के लिए खुद को तैयार करने लगे.

उन्होंने चुनौतियों से लड़ने की अपनी क्षमता और हौसलों से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए आगे बढ़ते गए. जिंदगी की राह में आगे बढ़ने के लिए कल्पेश ने पढाई को एकमात्र सहारा बनाने की ठान ली थी. उनके पिता एक छोटा का बिज़नेस करते थे और वहीं उनकी आय का एकमात्र साधन था.

कल्पेश जैसे-जैसे बड़े होते गए उन्होंने पढाई के साथ-साथ पिता के कारोबार में हाथ बढाना भी शुरू कर दिया. लेकिन दुर्भाग्यवश इसी दौरान उनके पिता उनका साथ छोड़कर दुनिया से चल बसे. पिता के दि’हांत से परिवार को मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा. परिवार में बड़ा होने के नाते अब सारी जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई.

आखिरकार उन्हें पढाई छोड़कर पिता के कारोबार को आगे बढ़ाने का फैसला लेना पड़ा. अब कल्पेश के सामने चुनौतियों का बहुत बड़ा पहाड़ खड़ा था. एक तरफ वह चलने में असमर्थ थे और दूसरी तरफ बंद होने की कगार पर पहुंच चुके बिजनेश को संभालना था, बहन की शादी की उम्र हो चुकी थी, भाई की पढाई, परिवार चलाने की जिम्मेदारी सामने खड़ी उन्हें चुनौती दे रही थी.

ऐसे में कल्पेश ने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नया करने का प्लान बनाया. इसके लिए उन्होंने पहले मार्केट में एक बड़ी संभावनाओं को तलाशने के लिए बिज़नेस चलाने के तौर-तरीके सीखे. इसी के साथ उन्होंने डायमंड सप्लाई का काम शुरू किया जो छोटे स्तर से शुरू हुआ लेकिन आज ऊचाइयों पर पहुंच गया.

आज के समय में कल्पेश डायमंड ट्रेडिंग बिजनेस में करोड़ों रूपये का सालाना टर्न ओवर रखते है. यह उनकी एक बड़ी और अदभुत सफलता है. अब कल्पेश की शादी हो चुकी है और उनके दो बच्चे भी है. शरीर रूप से दिव्यांग कल्पेश आज सभी सुख-सुविधाओं से पूर्ण ख़ुशी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं.

मौजूदा समय में कल्पेश दिव्यागों के कल्याण के लिए एक सामाजिक संगठन भी चलाते है और कई लोगों को नई राह और नई जिंदगी देते हैं. सिर्फ 11 वीं तक की पढाई कर सके कल्पेश की जिंदगी की यह कहानी हमें बताती है कि चुनौतियों से डरना नहीं चाहिए बल्कि उनका डट कर सामना करना चाहिए.