जानिए कौन थे गुलाम रसूल गलवान, जिनके नाम पर है रखा गया गलवान घाटी का नाम

जानिए कौन थे गुलाम रसूल गलवान, जिनके नाम पर है रखा गया गलवान घाटी का नाम

भारत और चीन की सेनाएं लद्दाख में मई के पहले सप्ताह से आमने-सामने है. इसी बीच 15 जून की रात को लद्दाख के गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिं’सक झड़प देखने को मिली थी. इस झड़प के दौरान भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए. गलवान घाटी पूर्वी लद्दाख में अक्साई चीन के इलाके में हैं. चीन वर्षों से इस इलाके पर पूरी बेशर्मी से अपना दावा जताते रहे है. लेकिन क्या आप गलवान घाटी की पूरी कहानी जानते हैं.

चलिए आपको गलवान घाटी से जुडी पूरी कहानी बताते है. आज हम आपको बताएंगें कि आखिर क्यों अक्साई चीन की इस घाटी को गलवान घाटी कहा जाता हैं?

दरअसल गलवान घाटी को गुलाम रसूल गलवान के नाम पर जाना जाता हैं. अब आपके मन में सवाल उठा रहा होगा कि गुलाम रसूल गलवान कौन हैं और आखिर क्यों इनके नाम पर इस घाटी का नाम पड़ा?

इस घाटी का नाम गलवान पड़ने की कहानी की शुरुआत हुई 1878 में जब लेह जिले में घोड़ों का व्यापार करने वाले एक व्यापारी के घर पर एक बच्चे का जन्म हुआ. जिसका नाम गुलाम रसूल रखा गया.

कश्मीर में घोड़ों का करोबार करने वाले समुदाय को गलवान कहा जाता है. इसलिये गुलाम रसूल के नाम के आगे गलवान भी लग गया और उनका पूरा नाम गुलाम रसूल गलवान हो गया.

बताया जाता है कि जब गलवान महज 12 वर्ष के थे तभी उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था. इसके बाद वह चरवाहे और बंजारों की जिंदगी जीते रहे. इस दौरान वह लद्दाख की घाटियों में लगातार घूमते रहे.

जिसके चलते उन्हें इस घाटी के हर पहाड़ी रास्तों और दर्रों की अच्छे से जानकारी हो गई थी. ऐसा भी कहा जाता है कि गुलाम रसूल गलवान दुर्गम से दुर्गम घाटियों में भी जाने से नहीं कतराते थे.

इस दौरान ब्रिटिश हुकुमत थी और अंग्रेज अधिकारियों अक्सर ही दुर्गम नदियों, घाटियों, दर्रों और पहाड़ियों की खोज व ट्रैकिंग के लिये निकलते थे. लद्दाख में उन्हें भूल-भूलैया वाली घाटियों में मदद के लिये किसी स्थानीय शख्स की जरूरत होती थी.

ऐसे में गुलाम रसूल गलवान लगातार अलग-अलग दल के साथ गाइड बनकर जाते थे. दुर्गम से दुर्गम इलाकों में भी आसानी से चले जाने और खड़ी चट्टानों पर चढ़ पाने के कारण वह कई अंग्रेज अधिकारियों के चहेते बन गये थे.

इसी दौरान लद्दाख स्थित चांग छेन्मो घाटी के उत्तर में साल 1899 में एक ट्रैकिंग दल को मौजूद इलाकों का पता लगाने के लिये भेजा गया. यह दल घाटी से होकर बहने वाली एक नदी के स्त्रोत का पता लगाने के लिए निकला था. इस दल ने अपनी मदद के लिए रसूल गुलाम गलवान को भी साथ ले लिया.

इस दल ने दुर्गम घाटी और नदी के स्त्रोत का पता लगा लिया लेकिन वो वहां फंस गए. मौसम खराब होने के चलते वो रास्ता भी भूल गए. ऐसे में गुलाम रसूल ने उन्हें घाटी से बाहर निकाला और उनकी जिंदगियां बचाईं.

इसी से खुश होकर ट्रैकिंग दल को लीड कर रहा अंग्रेज अधिकारी ने गुलाम रसूल गलवान से कहा कि वो जो मांगेंगे उन्हें वह इनाम दिया जाएगा. वह जितना चाहे इनाम मांग सकता हैं. जिस पर गलवान ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए.

गलवान ने आगे कहा कि यदि आप कुछ देना ही चाहते है तो फिर इस नदी और घाटी का नाम उसके नाम पर रख दिया जाये. अंग्रेज अधिकारी ने उनकी बात को मानते हुए घाटी का नाम गलवान घाटी और वहां से होकर बहने वाली नदी को गलवान नदी नाम दिया.

बता दें कि गुलाम रसूल गलवान ने अंग्रेज अधिकारियों के साथ बिताये समय, लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों की ट्रैकिंग और अपनी जिंदगी को लेकर एक किताब भी लिखी. उनकी किताब का नाम है सर्वेंट ऑफ साहिब्स हैं. इस किताब की प्रस्तावना अंग्रेज अधिकारी सर फ्रांसिस यंगहसबैंड ने लिखी थी.

साभार- नवभारत