बिकाऊ भारतीय मीडिया ने कोरोना को मुस्लि’म से जोड़ा, तो लोगों ने कैसा सबक सिखाया देखें

दोस्तों आपको अच्छी तरह से पता होगा जब से देश में कोरोना वायरस को लेकर लॉक डाउन की स्थिति बनी उसके बाद से जो जहां था वहां पर रह गया, क्योंकि देश भर में सभी जगह से आवाजाही बंद कर दी गई थी. भारतीय रेल, जो किसी भी हालात में बंद नहीं हुई वह भी बंद हो चुकी थी. तमाम बसें, निजी वहां और जो भी आने जाने के लिए साधन थे सब कुछ बंद हो चुका था.

इसके अलावा जो लोग दूसरे प्रदेशों में रोजगार खातिर गए थे, उनके पास अब अपने वतन लौटने का कोई विकल्प नहीं बचा था. लिहाज़ा उन लोगों ने पैदल ही सफर करना शुरू कर दिया, जिसके चलते कई लोगों को खाने की किल्लत भी हुई, यहाँ तक के कई लोगों की जन तक चली गयी. छोटे-छोटे मासूम बच्चों के साथ मजदूर लोगों का परिवार सड़कों पर सेंकडों किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर था.

ये अमीश देवगन हैं, सोशल मीडिया पर इन्हें ‘भडवा पत्रकार’ कहा जाता है

ameesh devgan urf bhadwa patrkar

इसके अलावा लगभग सभी राज्यों के सभी शहरों में जो गरीब तबके के लोग थे, यानी कि ऐसे लोग जो रोज कुआं खोदकर रोज पानी पीते थे और जिनकी आय बहुत मामूली जो 100-200 रुपए रोजाना या फिर इतनी भी नहीं कमाने वाले लोग थे. ऐसे लोगों के सामने अपनी आजीविका चलाने का एक बड़ा संकट खड़ा हो चुका था.

वैसे भी पिछले काफी महीनों से देश की आर्थिक हालात भी सही नहीं थे. नोटबंदी और जीएसटी के चलते लोगों के काम धंधे पहले ही खराब चल रहे थे, जिसके चलते आर्थिक तंगी बनी हुई थी. जब देश में लॉक डाउन की स्थिति पैदा हुई, किसी के बाहर निकलने पर पाबंदी लगी उसके बाद से देश में सबसे पहले सिर्फ और सिर्फ मुस्लि’म समुदाय के नौजवान ही आगे आए.

ट्विटर पर ‘मीडिया वायरस’ ट्रेंड करने लगा

Media Virus

देखते ही देखते सोशल मीडिया समेत हर जगह इनकी ही चर्चा होने लगी, अब भारतीय दलाल मीडिया को यह आखिर कैसे भा सकता था. लिहाजा इस समय उनके पास ऐसा कुछ काम नहीं था कि वह उस पर न्यूज़ चला सकें, या फिर डिबेट चला सकें.

सोशल मीडिया पर लॉक डाउन होने के बाद से तमाम वीडियो फूटेज और फोटो पोस्ट इस बात के गवाह थे कि देश भर का मुस्लि’म समुदाय इस लॉक डाउन की अपात स्तिथि में अपने देश के सभी ज़रूरतमंद लोगों की खिदमत में लगा हुआ है.

मुस्लि’म समुदाय ने तन-मन-धन से लोगों की सेवा करने में कोई कसर बाकि नहीं रहने दी. हालाँकि इस दौरान भी कुछ शहरों में इनके इस तरह से लोगों को खाना बाँटने पर आपत्ति हुई, और उन्होंने कोई न कोई रोड़ा अटकाने की कोशिश की. लेकिन देश का मुस्लि’म समुदाय का नौजवान निस्वार्थ भावना के साथ भूखे लोगों को खाने का सामान, या बना हुआ खाना बांट रहा था.

Bikau Media

तब ऐसे में हमारे देश का मीडिया, जो पहले ही मुस्लि’म समुदाय से खार खाए बैठा है. वह आखिर इनको हीरो कैसे बना था. देश का बिकाऊ मीडिया लोगों को भुखमरी से निजात दिलाने की वजाए, लोगों को यह बता रहा था कि घरों में भुखमरी से बेहाल तुम सारे दिन कैसे अपना घर में टाइम पास करें.

अंताक्षरी खेले, टीवी पर रामायण, महाभारत के सीरियल देखें. इसके अलावा और भी कई आलतू फालतू के काम. इसके बाद मीडिया को अब चाहिए था मुस्लि’म समुदाय के खिलाफ कुछ ऐसा जबरदस्त, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. यानि के इनके अब तक के किये गए नेक कामों को किस कदर ताक पे रखकर देश के एक बड़े भाग को मुस्लि’म लोगों के खिलाफ़ नफ़रत भरा माहौल तैयार करना था.

लिहाज़ा थोड़ी सी म्हणत के बाद उन्हें दिल्ली के निज़ामुद्दीन में स्तिथ मरकज़ का मुद्दा मिल गया. हालांकि यह बात अलग है कि जिस तरह से निजामुद्दीन में लोग फंसे हुए थे ठीक उसी तरह वैष्णो देवी और स्वर्ण मंदिर में भी कई भारतीय विदेशी लोगों समेत फंसे हुए थे.

balatkar ka aropi suresh chawhanke

क्योंकि लॉक डाउन का भाषण रात को 8:00 बजे दिया गया था, और उन्होंने रात को सिर्फ 12 बजे तक का टाइम दिया था. अब किसी देश से बाहर जाने वाले को इन 4 घंटों में अपने लिए टिकट का इंतजाम करना, फ्लाइट पकड़ना. या अपने ही देश में कहीं भी जाने के लिए ये वक़्त बहुत ही कम था. दिन होता तो इन्सान कुछ कर भी सकता था, लेकिन रात के वक़्त ये नामुमकिन है.

भारतीय बिकाऊ मीडिया को मसाला मिल चुका था, अब वह सिर्फ देश भर के मुसलमा’नों को लेकर तबलीगी जमात को हथिया-र बनाकर गरिया रहे हैं. कोरोना की वजह से देश की हालत कैसी होती जा रही है, इस पर बिकाऊ मीडिया पर्दा डालने की पुरजोर कोशिश कर रहा है. यह मीडिया का वह दोहरा चरित्र है जो हुक्मरानों से सवाल पूछने की जगह हमेशा उनके कुक’र्म पर पर्दा डालने का काम करता है.

Dalal Media ke kuch patrkar

हमारी बिकाऊ मीडिया को देश भर में मुसलमा’नों के खिलाफ़ नफर’त भरने के लिए बस एक उर्दू नाम वाला चाहिए होता है. और उसके बाद तो मान लीजिए कि इनके आगे किसी की नहीं चल सकती. निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वाले गिने-चुने पत्रकार बचे हैं, तो फिर ऐसे में ज्यादा कुछ उम्मीद लगाना बेकार है.

इसके अलावा देश में ऐसे लोग भी हैं जिनकी वजह से काफी कुछ खुलासे होते हैं, या जिन लोगों में सच को सच और झूठ को झूठ कहने की हिम्मत है. ऐसे लोगों की संख्या हालाँकि बहुत कम है, लेकिन फिर भी इतना भी काफी है. जो इस दलाल मीडिया की पोल खोलने के लिए कमर कसे हुए हैं.

जमात में फंसे हुए लोगों को इन्होंने छुपे हुए लोग करार दिया, और दूसरी जगह फंसे हुए लोगों को फँसा हुआ ही बताया. किसी छोटी सी बात को नमक मिर्च लगाकर लोगों को भड़काने का काम हमारे भारतीय मीडिया से अच्छा कोई नहीं कर सकता.

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