जिस देश में धर्म देखकर चुने जाते है PM-राष्‍ट्रपति, वह देश दिवालिया और कंगाल होने की कगार पर पहुंच जाते है

धर्म लोगों को इंसानियत और जीने का सही तरीका भी सीखता है लेकिन जब धर्म राजनीति पर हावी होकर देश के सर्वेसर्वा के चयन में बड़ी भूमिका निशाने लगता है तो ऐसी सरकार सिर्फ धार्मिक दिखावा करने में रह जाती है जबकि विकास पीछे छुट जाता है. दुनिया में आर्थिक संक’ट के बादल छाए है और इसी बीच लेबनान में हालात बेकाबू होते जा रहे है. इसी बीच अब विदेशमंत्री नसीफ हित्ती ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

दरअसल लेबनान में 20 घंटे तक बिजली कटौती चल रही है, सड़कों पर कूड़े के ढेर लगे हुए, कमजोर आधारभूत संरचना और एक के बाद एक आपदाओं आ रही है. जिसके बाद विश्लेषकों का कहना है कि अब यह देश दिवालिया होने की तरफ बढ़ने लगा है.

वहीं नसीफ हित्ती ने इस्तीफा देने के बाद सरकारी आवास भी खाली कर दिया है. बताया जा रहा है कि हित्ती सरकार के प्रदर्शन और सुधार को लेकर किये गए वादों पर कोई काम नहीं करने को लेकर नाखुश थे. इन स्थिति के पीछे एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि लेबनान में धर्म के आधार पर प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति बनते हैं.

लेबनान बहुत तेजी से आर्थिक दिवालियापन, उच्च महंगाई दर, संस्थानों के खंडित होने और तेजी से गरीबी की तरफ बढ़ रहा है. वहीं कोरोना महामारी ने संक’ट से जूझ रहे लेबनान में संक’ट को और बढ़ा दिया है. बड़ी तादात में लोगों की नौकरियां जा रही है. अस्पतालों के बंद होने की कगार पर पहुंच चुकी है.

अपराध तेजी से बढ़ रहा है. सेना के पास अपने सैनिकों को भोजन खिलाने के लिए फंड नहीं है. अरब में विविधता और मेलमिलाप के आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित लेबनान के इस संकट से चलते बिखरने का खत’रा बढ़ने लगा है और साथ ही अराजकता फैलने का डर भी बन गया है.

लेबनान 18 धार्मिक संप्रदाय, कमजोर केंद्रीय सरकार और मजबूत पड़ोसियों के चलते क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता का शिकार हो रहा है. लेबनान शुरू से ही सऊदी अरब और ईरान की वर्चस्व की लड़ाई का शि’कार बनता रहता है, हालांकि मौजूदा समस्या स्वयं लेबनान ने उत्पन्न की है, जो सालों से राज कर रहे भ्रष्ट और लालची राजनीतिक वर्ग के चलते उत्पन्न हुई हैं.

दुनिया में सबसे अधिक सार्वजनिक कर्ज में होने के बाद भी वो कई सालों से दिवालिया होने से बचता रहा है. पिछली साल सरकार ने व्हाट्सएप मैसेज पर टैक्स लगाने की इच्छा जाहिर की थी जिसके बाद उसे पुरे देश में भारी विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा था.

इस आंदोलन में अपने नेताओं से परेशान लोग खुलकर सामने आए जिसने आग में घी का काम किया. वहीं विदेशी मुद्रा की कमी के चलते लेबनानी पाउंड का मूल्य ब्लैक मार्केट में 80 प्रतिशत तक गिर पड़ा है और अब मूलभत वस्तुओं व खाने पीने के समान की कीमतें तेजी से बढ़ रही है.

दरअसल लेबनान में धर्म के मुताबिक प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति चुने जाते है. आपको बता दें कि लेबनान में 1975-1990 तक चले गृह युद्ध के बाद एक नई राजनीतिक व्यवस्था लागू की गई थी.

इस नई व्यवस्था के अनुसार यह तय किया गया था कि देश का राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद का अध्यक्ष शिया मुसलमान ही बनेगा.

इसके आलावा संसद की सीटों को भी दो बराबर हिस्सों में मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच बांट दिया गया था. इतना ही नहीं यह नियम यही तक नहीं थे बल्कि इन्हें नौकरशाही में भी लागू किया गया. लेबनान में 27% शिया, 27% सुन्नी, करीब 40% ईसाई और 6% आबादी द्रूज है. लेकिन अब लेबनान के लोग इस राजनीतिक सिस्टम से तं’ग हो चुके है और काफी समय से इसे बदलने की मांग कर रहे हैं.

साभार- जी न्यूज़