VIDEO: क्या भारत के मुसलमानों को इग्नोर करना चुनाव जीतने की गारंटी हो गया है: विश्लेषण

राष्ट्र राजधानी दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत हुई, आप जश्न मना सकते हैं लेकिन पूरे चुनाव को जूम करके देखिए तो “AAP” की जीत में ही कहीं न कहीं हिन्दू-बहुसंख्यकवाद की जीत छुपी हुई है. AAP पार्टी की बदली हुई चुनावी रणनीति ने यह साबित कर दिया कि ये देश अब केवल हिंदुओं का देश रह गया है।

राजनीतिक पार्टियों के पास एक ही विकल्प है, यदि आप सीधे-सीधे हिन्दूवाद का समर्थन नहीं कर सकते, तो आप हिंदूवाद के खिलाफ एक शब्द मूंह से निकाल भी नहीं सकते। एक अघोषित बृहद सहमति बन चुकी है कि मुसलमानों को कम्प्लिटली इग्नोर करना इस देश में चुनाव जीतने के लिए अनिवार्य हो गया है।

आम आदमी पार्टी का मुसलमानों को लेकर इतना डिफेंसिव होना, और अरविन्द केजरीवाल का टीवी चैनलों पर जा जाकर खुद को हनुमान भक्त साबित करना दिखाता है, कि हिन्दू बहुसंख्यकवाद अब हर पार्टी के राष्ट्रीय सिलेबस में अघोषित रूप से शामिल हो चुका है। समाज में आया ये बदलाव ही संघ की जीत है।

हलाकि भाजपा चुनाव नहीं जीती, लेकिन संघ का अपना काम हो चुका है। और आज नहीं तो कल संघ चुनाव जीत ही लेगा।

संघ की साम्प्रदायिक राजनीति पूरे चुनाव पर इतनी हावी हो रही है कि शाहीनबाग की भीषण ठंड में सड़क पर सोने वाली मुस्लिम औरतों के लिए भी, प्रदेश के मुखिया के मुंह से एक शब्द न निकला।

दिल्ली में ही स्थित जामिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरियों में आ’सूं गै’स के गोले दा’गे गए, लेकिन दिल्ली के मुखिया की हिम्मत न हुई कि एक शब्द बोल दे।

दिल्ली के ही बीचोंबीच बने जेनएयू विश्वविद्यालय के गर्ल्स हॉस्टल्स में नकाबपोश गुं’डों द्वारा नं’गा नाच किया गया लेकिन दिल्ली का मुखिया तब भी शांत रहा।

नागरिकता कानून और एनआरसी की पूरा देश आग में झुलस रहा है लेकिन दिल्ली का मुखिया तब भी शांत ही रहा. उसने एक चूं तक न की।

ऐसी भी क्या डेमोक्रेसी? जिसमें अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे पर केवल इसलिए खुलकर आगे न आया जाए क्योंकि इससे आप पर मुस्लिम सपोर्टर होने का झूठा आरोप लग जाएगा।

अल्पसंख्यकों के साथ केवल इसलिए ही नहीं आया जाएगा क्योंकि इससे संघ जैसा नितांत धर्मांध संगठन भी आप पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगा सकता है।

एक तरह से दिल्ली चुनाव, संघ के संप्रदायिक भाषणों के आगे प्रगतिशील विचारों का, शरीर के बल लोट जाने जैसा है।

एकतरह से ये संदेश है कि चुनाव जीतने के लिए अल्पसंख्यकों को मरने के लिए भी छोड़ना भी पड़ेगा तो पार्टियां छोड़ देंगी।

संघ की नीतियों ने सभी पार्टियों को हिन्दू बहुसंख्यकवाद के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया है।

इस भय में ही लोकतंत्र की अर्थी छुपी हुई है। यदि किसी देश की पार्टियां अपने ही देश के कमजोरों, अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं हो सकतीं, तो क्या तब भी वह देश लोकतांत्रिक रह जाता है? मैं नहीं मानता।

यह आलेख श्याम मीरा सिंह के फेसबुक टाइम लाइन से लिया गया है

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