इतिहास जान लिजिए, भारतीय मीडिया जो जह’र बो रहा है, उसका अंजाम कितना घातक होगा

पिछले कुछ सालों में भारतीय मीडिया का घनघो’र सां’प्रदा’यिकरण देखने को मिल रहा है. आपको याद होगा कि कैसे दो साल पहले यूपी के बुलंदशहर में गो’ह’त्या की महज अफवाह पर भी’ड़ मरने मारने पर आतुर हो गई थी. लोगों पर खू’न सवार हो चुका था. इस त्रासदी में एक पुलिस इंस्पेक्टर की जा’न भी चली गई थी. आपको यह भी याद होगा कि इस घटना की जमीन सां’प्रदा’यिक प्रो’पैगेंं’डा ने बनाई थी. देश में हिंदू मुस्लिम के बीच की खांईं इन दिनों गहरी हो चुकी है. ये और आगे जाएगा या रुकेगा, ये ईश्वर जानें लेकिन याद रखिए स्थिति ऐसी ही बनी रही तो भारत एक ख’तरना’क और घा’तक अंजाम तक पहुंच जाएगा.

ऐसा ज’हरी’ले माहौल को तैयार करने में मीडिया की भी बड़ी भूमिका रही है जो गो’ह#त्या, लव जि’हाद और अब कोरोना जि’हाद जैसे विषयों को लेकर एक ऐसी सां’प्रदा’यिक भी’ड़ तैयार कर रहे हैं जो हर छोटी मोटी या झूठी घटनाओं की बात पर म’रने मा’रने पर उतारु हो रही है.

दरअसल इन न्यूज चैनलों को इस बात का कोई अंदाजा ही नहीं है कि भारत जैसे वि’वि’धता’पूर्ण देश में इस तरह का माहौल बनाकर कहां ले जा रहे हैं. उन्हें इस प्रकार की ऐतिहासिक घटनाओं से सबक लेना चाहिए कि क’ट्टरवा’द और सां’प्रदायि’कता किसी भी देश को कहां से कहां तक पहुंचा सकती है.

जान लिजिए रवांडा का इतिहास

1994 की बात है. गरीब देश के तौर पर जाने जाने वाले रवांडा में दो जनजाति समूहों हुतू और तुत्सी के बीच तना’व की वजह से सं’घर्ष का माहौल था. रवांडा के रेडियो स्टेशनों और एक पत्रिका कंगूरा ने इस दौरान दोनों समूहों के बीच खू’ब आ’ग लगाया. दोनों समुदायों के बीच गृह यु’द्ध शुरु हो गया.

 

सैकड़ों लोग मा’रे गए और लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थी जीवन जीने के लिए मजबूर हो गए. यह आधुनिक विश्व इतिहास के सबसे बड़े न’रसं’हार के तौर पर जाना गया. जब सब कुछ खत्म हो गया तो इन रेडियो स्टेशनों को नफरत के रेडियो के नाम से जाना गया.

इन रेडियो स्टेशनों से ऐसी खबरें और कार्यक्रम प्रसारित किए जाते थें जिनसे हुतू आदिवासियों में तुत्सी आदिवासियों के खिलाफ नफरत, डर और अ’विश्वा’स का वातावरण बनें. इससे रेडियो स्टेशनों की आमदनी तो बढ़ रही थी लेकिन समाज टूट चुका था. एक दिन ऐसा भी आया जब रवांडा क’त्लेआ’म और गृह यु’द्ध का देश बन गया.

जर्मनी में अखबार डे र स्टूमेर

20वीं सदी में जर्मनी में नाजी पार्टी और उसके नेता एडोल्फ हिटलर के उभार के दौरान वहां का प्रिंट और रेडियो मीडिया य’हूदि’यों के खिलाफ नफरती माहौल बनाने लगा जैसे आज भारतीय मीडिया कर रहा है. बु’द्धिजी’वियों, मध्यम मार्गियों और ट्रेड यूनियनों के खिलाफ भ’ड़का’उ अभियान चला कर हिं’सा के लिए उकसाया जाता रहा.

अखबारों ने एकतरफा जातीय घृणा और नफरत से भरे खबरों को प्रकाशित किया. य’हूदि’यों के बारे में गलत तथ्य छा’पे गए और अफवाहों को हवा दी गई. क्र’मब’द्ध तरीके से लोगों के दिमाग में भर गया कि य’हू’दी ईसाईयों के बच्चों को मा’र कर उनका खू’न पी जाते हैं. एक तरह का का’ल्पनि’क डर एक वर्ग विशेष के खिलाफ पैदा किया गया.

इसका फल भी जर्मनी को भुगतना पड़ा. बड़े पैमाने पर य’हूदि’यों का नर’संहा’र हुआ. जर्मनी बर्बा’द हुआ. जैसे ही जर्मनी में नाजी पार्टी का अंत हुआ, जहरीला प्रो’पैगें’डा चलाने वाले अखबार डे र स्टूमेर के मालिक स्ट्रिचर को फां’सी की सजा भी हुई.

आज भी देश के अधिकांश न्यूज चैनल मोटे मुनाफे और टीआरपी के चक्कर में नफरती बन बैठे हैं. सां’प्रदायि’क’ता से भरी खबरें दिखा कर लोगों की नसों में नफरत और अ’विश्वा’स भरा जा रहा है. अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो इससे निजात पाने में पीढ़ियां लग जाएंगी.
क्या हम रवांडा और जर्मनी में जो कुछ हुआ, उससे सबक सीखने को तैयार हैं.

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