मध्यप्रदेश के किसानों को कॉन्ट्रैक्ट खेती के नाम पर लगाया चूना, न व्यापारी का पता और न फर्म का पता

कॉन्ट्रैक्ट किसी से और बिल किसी दूसरे का, बिल पर ना ही बिल नंबर डाला हुआ है और ना ही टिन नंबर, किसान बोले अगर ऐसा ही चला तो जल्द हो जाएंगे बर्बा'द

किसान आंदोलन को चलते हुए अब महीना भर होने को है लेकिन अभी तक सरकार और किसानों के बीच कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है जहां एक ओर सरकार इन कानूनों को किसानों के हित में बता रही है वहीं किसान इन्हें काले कानून करार दे रहे हैं।

लेकिन इस सब के साथ देश भर में यह बहस छिड़ी हुई है कि इन कानूनों की सच्चाई क्या है इसलिए आज हम बताने जा रहे हैं कुछ किसानों की कहानी जो बताते हैं कि सरकार ने नए कृषि कानूनों का हवाला देकर ही काम किया लेकिन उसके बावजूद भी हमें घाटा ही हुआ.

कॉन्ट्रैक्ट किसी और से हुआ और बिल किसी दूसरे का था, बिल पर, बिल नंबर नहीं डाला हुआ है और ना ही कोई टिन नंबर

Contract kheti ke naam par thage gaye mp ke kisan

दरअसल यह कहानी मध्यप्रदेश के होशंगाबाद के कुछ किसानों की है बता दें कि पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश सरकार यह दावा करती रही है कि उसने नए कृषि कानूनों की बदौलत किस तरह से किसानों को लाभ पहुंचाया और यही नहीं 24 घंटे के अंदर किसानों के साथ न्याय भी किया लेकिन इसकी हकीकत कुछ और ही थी.

पुष्पराज कहते हैं कि वह कभी अनुबंध पर खेती की सलाह नहीं देंगे

भोंखेड़ी कलां के रहने वाले पुष्पराज सिंह का कहना है कि वे कभी यह नहीं कहेंगे कि किसान अनुबंध पर खेती करें और उसका उनके पास वाजिब कारण भी है.

पुष्पराज 4 साल से खेती कर रहे हैं और इस बार उन्होंने 40 एकड़ भूमि पर धान लगाया पुष्पराज कहते हैं कि अब तक उन्हें अनुबंध में कोई दिक्कत नहीं आ रही थी और इस बार भी कंपनी से जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ उसमें कहा गया था कि मंडी में जो भी रेट होगा उससे 50 रुपये ज्यादा देंगे.

आगे पुष्पराज कहते हैं कि जब मंडी में 2300 से 2400 रेट था तब तक अनुबंध में कोई दिक्कत नहीं आई लेकिन जैसे ही मंडी में रेट 2950 हुआ तो अब कंपनी को 3000 में खरीद करनी थी लेकिन कंपनी ने खरीद करने के बजाय फोन ही बंद कर डाला.

ऐसे में पुष्पराज कहते हैं कि मध्य प्रदेश सरकार यह दावा करती है कि उन्होंने 24 घंटे के अंदर उन्हें न्याय दिलाया गया परंतु न्याय की बात तो तब आती जब कंपनी ने कोई बेईमानी की हो.

यहां तक कि उनका बिल भी अन्नपूर्णा ट्रेडर्स के नाम से है जबकि उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट फार्च्यून के साथ किया था. यही नहीं सरकार से शिकायत के बाद जो कार्यवाही की गई और उसके बाद जो बिल मिला उस पर ना तो बिल नंबर है ना टिन नंबर.

इससे आगे पुष्पराज एक और हकीकत सामने लाते हैं पुष्पराज का कहना है कि अगर कंपनी मंडी से ऊंचा दाम भी देती है तो इसमें एक और समस्या है कंपनी की तरफ से किसानों को दवा की किट दी जाती है जिसकी भले ही किसान को जरूरत हो या ना हो उसे लेनी ही पड़ती है.

ऐसे में अगर उन्हें ऊंचा दाम मिला भी हो तो वह दवा की किट की कीमतों में उसकी भरपाई कर लेते हैं. ऐसे में अब पुष्पराज का कहना है कि वह किसी को भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की सलाह नहीं देंगे वहीं पुष्पराज मानते हैं कि इससे किसान बर्बाद हो जाएंगे.

पुष्पराज के अलावा भी दूसरे किसानों का भी यही हाल है. कुछ ऐसी ही कहानी है गाड़ाघाट के रहने वाले बृजेश पटेल की. बृजेश पटेल ने 20 एकड़ में धान लगाया और फार्च्यून कंपनी से उनका कॉन्ट्रैक्ट भी था।

लेकिन अब कंपनी धान लेने से मना कर रही है कंपनी का कहना है कि इसमें हेक्सा यानी एक तरह का कीटनाशक लग गया है जिसकी वजह से कंपनी ने मना कर दिया.

ब्रजेश का कहना है कि हमने दो बार टेस्ट भी करवाया लेकिन कंपनी रिपोर्ट देने से मना कर देती है वहीं इस बार कंपनी ने रिपोर्ट देने के बहाने 8000 रुपये की मांग की.

अब बृजेश 20 एकड़ में लगाया धान घर में लेकर बैठे हैं । ब्रजेश का कहना है कि अब वे इसको मंडी में ही बेचेंगे.