सिक्खों जैसा कोई नहीं, जहां भी होते हैं, कमाल ही करते हैं, इनसे सीखना चाहिए

देश और दुनिया में इन दिनों कोरोना महामारी का आंतक देखने को मिल रहा है. क्या अमीर देश, क्या गरीब देश और क्या विकसित देश, क्या विकासशील देश सभी इसकी चपेट में आते जा रहे हैं. लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो चुकी है. गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों की जिंदगी आफत में आ चुकी है.

ऐसे में दौर में जब हर कोई अपनी पेट में चिंता कर रहा है, ऐसे में एक कौम है वो भी जो भारत में सबसे ज्यादा है फिर भी कुल आबादी का 02 प्रतिशत है. ठीक समझा आपने, हम बात कर रहे हैं सिक्खों की. जब सब लोग अपने पेट की चिंता कर रहे हैं तो ये दूसरें भूखा न रहे, उसके लिए सेवा कार्य में जुटे हुए हैं.

 

जब दूसरे लोग कोरोना से लड़ने के लिए घरों में लॉक डाउन होकर थाली पीट रहे हैं, दिया जला रहे हैं, इसमें हिंदू, मुस्लिम का एंगल खोज रहे हैं तब सिक्ख सड़कों पर खड़े होकर दूसरे का पेट भर रहे हैं. लंगर चला रहे हैं. सिक्खों की इसी भावना से प्रभावित होकर भारत के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने तारीफ की है.

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में अमेरिका में सेवा कर रहे सिक्खों की सराहना करते हुए कहा है कि गजब के होते हैं ये सिक्ख. जहां भी होते हैं, कमाल करते हैं. दूसरों के लिए जीते हैं. रवीश कुमार ने कहा कि मुझे तो यह लगता है कि वो किसी को दूसरा समझते ही नहीं.

रवीश कहते हैं कि अमेरिका में भी लॉकडाउन की स्थिति है. सड़क किनारे या वेयर हाउसों में ट्रक खड़े हैं और वहां के भी ड्राईवर भी भूखे रहने को मजबूर थें लेकिन इस मुश्किल दौर में सामने आई सिक्ख फॉर ह्यूमैनिटी. इस संस्था ने उन जगहों पर भी खाना देना शुरु कर दिया, जहां जाने की कोई सोच भी नहीं सकता था.

सिक्खों की विशेषता

असल सिक्ख जो अपने गुरुओं के बताए सिद्धांतों पर चलते हैं, वो किसी भी दूसरे धर्म, जाति या देश के लोगों से नफरत कर ही नहीं सकते. जिनके अंदर सिक्खी का डीएनए होता है, वो जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभु पायो के मार्ग पर चलता है क्योंकि यही उनके गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें बताया है.

ये वही देश है जहां 1984 में सिक्खों को खोज खोज कर मा’रा जा रहा था, वही सिक्ख आज खोज खोज कर लोगों को लंगर छका रहे हैं. इस विशेषता से दूसरों को सबक लेना चाहिए.

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