दिन रात कांग्रेस को गाली देने वाला मीडिया सोनिया गांधी के एक ही वार से बौखलाया

पूरा देश कोरोना वायरस की महामारी से त्राहिमाम कर रहा है. हजारों की संख्या में भारत की जनता कोरोना से पीड़ित है. सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और इधर भारतीय मीडिया है कि विज्ञापन और पैसे के लिए हाय तौबा मचा रही है. भारतीय मीडिया का चरित्र आज किसी से छिपा हुआ नहीं है, सरकार की चापलूसी और चमचागिरी में इन्होंने फर्जी और बेबुनियाद खबरें दिखा दिखा कर देश का माहौल जहरीला कर दिया है.

पूरा देश आज कोरोना से लड़ने के लिए त्याग की भावना के साथ काम कर रहा है. लॉकडाउन की वजह से लोगों का व्यापार और कामकाज प्रभावित हो रहा है लेकिन देश के लिए लोग यह सब कुछ देशप्रेम की भावना से बर्दाश्त कर रहे हैं लेकिन भारतीय मीडिया है कि इसे कोरोना के बीच भी पैसे चाहिए. पैसे की इस हवस ने भारतीय मीडिया के एक और चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है.

सोनिया गांधी ने दिया सुझाव

ऐसे वक्त में जब सांसदों को मिलने वाली विकास राशि से लेकर सैलरी तक में कटौती हो चुकी है तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार से अपील की थी कि देश के खजाने के पैसे को बचाने के लिए अगले दो साल तक सरकार को मीडिया में अपने विज्ञापन देने बंद कर देने चाहिए. सोनिया गांधी ने कहा था कि चाहे सरकार हो या फिर सार्वजनिक प्रतिष्ठान, इनका भारी भरकम बजट प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और ऑनलाइन विज्ञापन में खर्च होता है. देशहित में इन विज्ञापनों को दो साल के लिए बंद कर देना चाहिए. सोनिया गांधी ने ये सुझाव पीएम नरेंद्र मोदी को दिया था.

मीडिया में बौखलाहट

सोनिया गांधी के इस सुझाव पर मीडिया में जैसे खलबली मच गई. भारतीय मीडिया जिस प्रकार का व्यवहार इन दिनों कांग्रेस और गांधी नेहरु परिवार के साथ करती है, वो किसी से छिपा हुआ नहीं है लेकिन सोनिया गांधी के सिर्फ एक सुझाव ने इन लोगों के घटिया चरित्र को उजागर कर दिया. इन्हें जनता के दुख सुख से कोई सरोकार नहीं , देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था से कोई सरोकार नहीं. लोग मरें या जिएं इन्हें सिर्फ विज्ञापन चाहिए.

मीडिया संगठनों ने की सोनिया की निंदा

इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी ने सोनिया गांधी के सुझाव की निंदा करते हुए कहा है कि सोनिया गांधी को अपने सुझाव पर फिर से विचार करना चाहिए. वहीं एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया ने भी सोनिया गांधी के सुझाव पर आपत्ति जाहिर की है. वहीं न्यूज चैनलों के संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी सोनिया गांधी के इस सुझाव का विरोध किया है.

अब ये सभी मीडिया संगठन विधवा विलाप कर रहे हैं कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है लेकिन पिछले कुछ सालों में मीडिया का जो घटिया और गिरा हुआ चरित्र सामने आया है, उसे देखकर क्या लगता है कि ये लोकतंत्र का खंभा कहलाने लायक बचे हैं ?

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