पुलिस में नौकरी के लिए पहुंचे थें मुख्यमंत्री के पास, बना दिया विधायक और मंत्री

राजनीति में किस्से खूब सुनाए जाते हैं. इनमें से कई किस्से सही होते हैं और कई मनगढंत यानी झूठे भी. आइए, आज एक ऐसा ही राजनीतिक किस्सा हम आपको सुनाते हैं जिसे सुनकर आपको महसूस हो जाएगा कि किस्मत भी जीवन का एक बड़ा फैक्टर होता है, पर ये राजनीतिक किस्सा झूठा या मनगढ़ंत नहीं बल्कि सच्चा है.

यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो मुख्यमंत्री के पास पुलिस में नौकरी की पैरवी लेकर पहुंचा था और फिर क्या हुआ, उसे हम आगे आपको बताते हैं. यह सच्ची कहानी बिहार की राजनीति से जुड़ी हुई है.

कहानी बिहार की राजनीति की

कहानी है वर्ष 1994 की. इस दौरान बिहार के मुख्यमंत्री थें लालू प्रसाद यादव. अब भला, लालू प्रसाद यादव को कौन नहीं जानता. बिहार पुलिस में दारोगा की बहाली निकली हुई थी.

लालू प्रसाद यादव की पहचान बिहार में किसी नेता या मुख्यमंत्री से ज्यादा तथाकथित निचली जातियों के मसीहा के तौर पर थी. लालू को गरीब गुरबों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, शोषित वर्ग की प्रखर आवाज के रुप में जाना जाता था. लालू ने इसका खामियाजा भी खूब भुगता और आज भी लालू जेल में राजनीतिक वनवास काट रहे हैं. खैर हम बात करते हैं, अपनी कहानी की.

दलित युवक पहुंचा नौकरी के लिए

बिहार के औरंगाबाद जिले का एक युवक जिसका नाम था सुरेश पासवान. वो लालू प्रसाद यादव के पास पहुंच कर बिहार पुलिस में दारोगा की नौकरी के लिए गुहार लगाने पहुंच गया. सुरेश पासवान ने लालू यादव से प्रार्थना की हुजूर पढ़ा लिखा हुआ आदमी हूं.

बिहार पुलिस में दारोगा की बहाली निकली है, मुझे उसमें नौकरी दिलवा दिजिए. लालू यादव जुबान के जितने की कड़े थें, दिल के उतने ही सच्चे ने. लालू ने अपनी इस दरियादिली की सजा भी खूब भुगती. जिसको ज्यादा अपनाया या आगे बढ़ाया, उन्होंने ही लालू के पीठ में खंजर मारने में कोई कोताही नहीं बरती.

थाने का दारोगा क्या बनोगे बिहार का दारोगा बनो

सुरेश पासवान की बात सुनकर लालू प्रसाद ने कहा कि क्या करोगे थाने का दारोगा बनकर, बिहार का दारोगा बना देंगे तुमको. अभी जाओ, लेकिन संपर्क में रहना, मिलते जुलते रहना. सुरेश पासवान ऐसा ही करते रहें.

1995 का बिहार विधानसभा चुनाव

फिर वक्त आया 1995 में बिहार विधानसभा के चुनाव का. लालू प्रसाद अपनी पार्टी के लिए विधानसभा उम्मीदवारों का इंटरव्यू ले रहे थें. सुरेश पासवान भी पहुंच गए लालू के पास. लालू ने कहा कि तुम तो दारोगा बनने के लिए पैरवी लेकर आए थें. अब चुनाव लड़ना चाहते हो. कौन देगा तुम्हें वोट, बताओ ? लालू का दूसरा सवाल था, चुनाव लड़ने में पैसा खर्च होता है, है तुम्हारे पास, खर्च कर सकते हो चुनाव में.

सुरेश पासवान का जवाब

सुरेश पासवान ने लालू को कहा कि पैसा तो नहीं है हुजूर लेकिन जहां तक वोट की बात है तो वोट हमको कोई क्यों देगा, वोट तो आपके नाम पर मिलता है, आपको वोट देते हैं लोग. लालू ने सुरेश पासवान को कोई आश्वासन नहीं दिया. सुरेश पासवान निराश हो गए.

लेकिन अगले दिन जब अखबार सुबह सुबह आया तो देव सुरक्षित विधानसभा सीट से जनता दल प्रत्याशी के रुप में सुरेश पासवान का नाम अंकित था. सुरेश पासवान को पार्टी ने सिंबल के साथ चुनाव लड़ने के लिए डेढ़ लाख रुपया दिया. इसमें करीब 25 हजार रुपये बच गए.

सवा लाख में ही चुनाव लड़ कर सुरेश पासवान ने शानदार जीत दर्ज की. दोबारा चुनाव में भी सुरेश पासवान इसी सीट से विधायक बनें और फिर बिहार की राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी हो गए.

सुरेश पासवान ने बचे हुए पैसे लालू को जब लौटाने चाहें तो लालू ने कहा कि ये तुम्हारी अमानत है. रखो, काम आएगा.

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