मुफ्तखोरी की आदत केजरीवाल की नहीं बल्कि पीएम मोदी की देन है, भक्तों ठोको ताली

क्या दिल्ली की जनता को मुफ्त खोरी की आदत पढ़ चुकी है. यह हम नहीं कह रहे है बल्कि ऐसा कहने वाले है दिल्ली में चुनाव लड़ने वाले नेता, चाहे वह बीजेपी पार्टी से हो या फिर कांग्रेस से हो या सत्ता धारी पार्टी के समर्थक या कुछ राज दरवारी झुकाव वाले पत्रकार हो क्योकि खास तौर पर इस शब्द को दिल्ली के वोटरों को अपमानित करने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा हैं।

अब सवाल तो दिल्ली की जनता से भी बनता है, आखिर इतनी महंगाई में इतना कुछ फ्री में क्यों चाहिए, क्या राजधानी में रहते हुए आपको कोई काम नहीं है है। आखिर फ्री की जिंदगी भी कब तक जीते रहेंगे. क्योंकि दिल्ली वालो ने मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और महिलाओं के लिये मुफ्त यात्रा के लालच में आकर आम आदमी पार्टी को वोट दे दिया है।

क्या किसी ने दिल्ली की चुनावी पार्टियों के घोषणा पत्र पर सवाल उठाये नहीं न इसको समझने के लिए जरा इन आंकड़ों पर ध्यान दीजिये। दिल्ली में 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त, सरकार हर साल 1720 करोड़ रुपये खर्च करती है, पानी मुफ्त देने का खर्च 400 करोड़ रुपये सालाना है और महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराने का खर्च 140 करोड़ रुपये है।

यानी इस मुफ्तखोरी का कुल बजट 2260 करोड़ रुपये है। यानी दो करोड़ की आबादी वाली दिल्ली के हर व्यक्ति को सरकार सिर्फ 1130 रुपये की मुफ्तखोरी करा रही है। और इस मुफ्तखोरी को कुछ इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि सारा खजाना लुटाया जा रहा है।

वही अब एनडीए सरकार के कार्यकाल पर ध्यान दीजिये एनडीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में कुल 6 लाख करोड़ की कर्जमाफी की थी। जिसमे किसानों का कर्जा सिर्फ 43 हजार करोड़ था। वही 5 लाख 57 हजार करोड़ पूंजीपतियों का कर्ज था। इसके अलावा इसी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में कारपोरेट कम्पनियों का 4,30,000 करोड़ रुपये का टैक्स माफ कर दिया। क्या इसे हम मुफ्तखोरी नहीं कहा जायेगा।

देश के हर सांसद को हर महीने सरकार की तरफ से 2,70,000 रुपये की सुविधाएं दी जाती हैं। एक विधायक को भी औसतन सवा दो लाख की सुविधा दी जाती है। क्या हम इसे मुफ्तखोरी नहीं कहेगे आप।

देश के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, अफसरों और दूसरे कई लोगों को शहर के प्राइम लोकेशन पर कई एकड़ में फैला बंगला मिलता है। इस बंगले में वह खेती करवाता है और कई लोग तो यह जमीन शादी के लिये किराए पर भी देते हैं। क्या इसे हम मुफ्तखोरी कहते हैं?

देश के सरकारी अधिकारी, नेता और कर्मचारी मिल कर अनुमानतः हर साल 70 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं, क्या इसे हम मुफ्तखोरी कहते हैं?तो फिर हम आम लोगों को मिलने वाली चंद वाजिब सुविधाओं को क्यों मुफ्तखोरी क्यों कहा जा रहा है।

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