10X10 के मामूली किराना स्टोर को, एक आइडिया के ज़रिये बना दी 5 करोड़ की कंपनी

जब हम किसी काम को पूरा करने की ठान कर जी जान से उस पर महेनत करते हैं तो फिर वह काम हर हाल में पूरा होता है। फिर चाहे भले ही वह काम किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हुआ हो। पर अगर हम उसे सफल बनाने के लिए ईमानदारी और जी जान से मेहनत करते है तो हमारा वह काम सफलता की ऊंचाइयों को जरूर ही छू सकता है जिसकी दुनिया भर में एक मिसाल कायम हो जाती है।

कुछ ऐसा ही मामला यूपी के सहारनपुर के रहने वाले एक युवक का है। युवक ने लोगों की मजाक और बातें सुनते हुए भी हिंमत नहीं हारी और अपने पिता से विरासत में मिली दुकान का नक्शा ही बदल दिया। तो चलिए जानते हैं कौन हैं वह युवक और क्या है यह स्टार्टअप की कामयाबी का सफर.

10X10 स्क्वैयर फीट के स्टोर का हो गया कायापलट

Kamla Store Vaibhav agrwal success story

उस युवक का नामवैभव है। उसे अपने पिता संजय अग्रवाल की ओर से किराने की दुकान विरासत में मिली थीं। दुकान तो मात्र 10X20 स्क्वैयर फीट की ही थी लेकिन वैभव ने उस दुकान में ऐसा परिवर्तन कर दिया कि दुकान को तो मानो कि पंख ही लग गए।

वैभव अग्रवाल के पिता संजय अग्रवाल सहारनपुर में एक छोटी-सी किराने की दुकान सभी घरेलू चीजें को बेचा करते थे। वैभव भी साल 2013 तक अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ ही पिता के काम में भी मदद करते थे।

लेकिन साल 2013 में वैभव का कॉलेज में प्लेसमेंट होने पर वह मैसूर चले गए। उनकी प्लेसमेंट एक मल्टीनेशनल कंपनी में होने के कारण उन्होंने एक साल तक रिटेल मार्केटिंग में रिसर्च वर्क किया।

इस समय के दौरान उन्हें जानने को मिला कि हर एक किलोमीटर पर हर एक प्रोडक्ट की पैकिंग से लेकर रंग आकार और यहां तक की दाम तक बदल जाता है। ये सारी ही बातें उन्हें मिक्स मार्केटिंग के जरिए से सीखने को मिली थी।

MBA तक की है पढ़ाई

वैभव ने एमबीए तक पढ़ाई की है। दिल्ली के एक काॅलेज से साल 2015 में उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर्स किया हुआ है। एकेडमिक और फैकल्टी की मदद से यहां उन्होंने शोध पर पूरा काम किया। साल 2018 में वह फिर अपने पिताजी की दुकान संभालने घर लौट आए और इस बार तो वह मार्केटिंग के सभी गुर भी सीख चुके थे।

वैसे तो पिताजी की बनी बनाई दुकान ही इन्हें विरासत में मिल गई। लेकिन इन सब बातों से हटकर मार्केटिंग के तमाम अनुभवों से गुजर चुके वैभव ने दुकान में कुछ अलग करने के बारे में सोचा। इस बदलाव का आरंभ उन्होंने दुकान के रंग रूप और सामानों के बदलाव से शुरू किया।

बिन जरुर के सामान को हटा दिया। साल ही स्टोर से महंगे महंगे प्रोडक्ट हटा कर कुछ कम दामों और बहेतर कवाॅलिटी वाले सामान को रिप्लेस किया। स्टोर की लाइटिंग और पेंटिंग को भी बदल दिया , ताकि ग्राहक आकर्षित हो सकें।

लोग बना रहे थे मजाक

वैभव के इस काम को देखकर लोग उस पर हंस कर उस्का मजाक बनाते थे। वैभव छोटी-सी इस दुकान को कंपनी का रूप देना चाहता था। और इसी कड़ी में उन्होंने अपनी 10×20 की दुकान को ‘The Kirana store Company‘ का नाम भी दे दिया।

उनकी महेनत रंग लाई और आज इस कामयाबी को देखते हुए उनसे करीब सौ लोग जुड़ चुके हैं। जो उनके साथ मिलकर साथ काम कर रहे हैं। वैभव भी आज अपनी किराना स्टोर को ‘स्मार्ट स्टोर’ का रूप दे चुके हैं। इससे उनकी भी आमदनी भी काफी बढ गई है।

एक साल के समय में ही वैभव को अपने दुकान से 8 गुना अधिक कमाई हुई। वैभव की कमाई और सफलता को देखते हुए सभी पुराने किराना स्टोर की वह काया पलटने लगे।

व्यापारियों और ग्राहकों को भी फायदा

वैभव की इस नई सोच और पहल के कारण किराना मालिकों को ऊंचे दाम और अच्छा मुनाफा मिल रहा है तो दूसरी ओर ग्राहकों को भी प्रोडक्ट्स लेने में आसानी हो रही है। मार्च 2020-21 तक इसके बढ़कर 5 करोड़ रुपये तक होने का अंदाजा भी लगाया है।

पुणे (महाराष्ट्र) की रहने वाली 'बुशरा त्यागी' पिछले 5 वर्षों से एक Freelancer न्यूज़ लेखक (Writer) के तौर पर कार्य कर रही हैं। 16 साल की उम्र से ही इन्होंने शायरी, कहानियाँ, कविताएँ और आर्टिकल लिखना शुरू कर दिया था।