CAA के खिलाफ शाहीन बाग़ पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया, आंदोलन के अधिकार को समझाया

सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग प्रदर्शन मामले में दिए फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि शाहीन बाग के फैसले में कानूनी तौर पर कोई कमी नहीं है. सार्वजनिक स्थानो पर विरोध करके दूसरों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता.

नई दिल्लीः पिछले साल कोरोना वायरस के क’हर के बीच दिल्ली के शाहीन बाग में बैठे प्रदर्शनकारियों को दिल्ली पुलिस ने जबरदस्ती हटा दिया. शाहीन बाग में बैठे प्रदर्शनकारियों से धरने को समाप्त करने की तमाम अपीलों की गई, मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों से लेकर समाज के अन्य सभी वर्गों के महत्वपूर्ण लोगों ने भी धरने को खत्म करने के लिए हाथ जोड़ रहे थे. लेकिन इनकी जिद्द के कारण सारा देश इनसे नाराज था।

वही प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार यह कहा कि भारत के नागरिकों पर (CAA) या (NRC) का कोई असर ही पड़ेगा। इसके बावजूद शाहीन बाग के प्रदर्शनकारि टस से मस होने के लिए तैयार नहीं थे। जब नागरिकता संसोधन एक्ट को लेकर लम्बे समय तक शाहीन बाग़ में प्रदर्शन चला तब प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

लंबे समय तक सार्वजनिक जगह को नहीं घेरा जा सकता है.

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि पुलिस के पास किसी भी सार्वजनिक स्थल को खाली कराने का अधिकार है और किसी सार्वजनिक जगह को घेर कर अनिश्चितकाल के लिए प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। वही अब सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में CAA के खिलाफ धरने को लेकर अपने पुराने फैसले पर विचार करने को इनकार कर दिया है।

शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन मामले में दिए फैसले पर दोबारा विचार की मांग खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक सड़क को अ’निश्चि’तका’ल तक के लिए नहीं रोका जा सकता है।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक विरोध करके सार्वजनिक स्थान पर दूसरों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता. विरोध का अधिकार कभी भी कही भी और हर जगह नहीं हो सकता।

दरअसल नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ शाहीन बाग में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक पु’न’र्विचा’र याचिका दाखिल कर यह मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा आंदोलन को लेकर अक्टूबर, 2020 में जो आदेश दिया गया, उसपर फिर से सुनवाई की जाए।

जिसपर कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक योजना विरोध प्रदर्शन और असंतोष व्यक्त करने के अधिकार देती है, लेकिन कुछ क’र्तव्यों’ की बा’ध्यता के साथ. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हमने सिविल अपील में पुनर्विचार याचिका और रिकॉर्ड पर विचार किया है. हमने उसमें कोई गलती नहीं पाई है।

पुणे (महाराष्ट्र) की रहने वाली 'बुशरा त्यागी' पिछले 5 वर्षों से एक Freelancer न्यूज़ लेखक (Writer) के तौर पर कार्य कर रही हैं। 16 साल की उम्र से ही इन्होंने शायरी, कहानियाँ, कविताएँ और आर्टिकल लिखना शुरू कर दिया था।