अमरीकी एजेंसी ने CAA का विरोध कर रहे मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की अपील की

नई दिल्लीः वाशिंगटन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे से पहले अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली अमरीकी एजेंसी यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानी (USCIRF) ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है. USCIRF ने भारत से कोरोना वायरस महा’मा’री के चलते विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे गिरफ़्तार हुए मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की मांग की है।

दरअसल, ब्राउनबैक दुनियाभर के अल्पसंख्यक समुदाय पर कोविड-19 के प्रभाव को लेकर संवाददाताओं को संबोधित कर रहे थे उन्होंने इस दौरान कहा, हमने भारत में कोविड-19 के संबंध में खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बयानबाजी और प्रताड़ना से जुड़ी खबरें देखीं है.सोशल मीडिया पर साझा की जा रहीं गलत जानकारियों और फर्जी खबरों की वजह से ये और बढ़ी हैं. ऐसी कई घटनाएं हुईं।

उन्होंने कहा- कोरोना वायरस संक्रमण फैलाने का आरोप लगाकर मुस्लिमों पर ह’मले किए जा रहे है. वही USCIRF ने मोदी सरकार को संबोधित करते हुए एक ट्वीट किया है. यह ट्वीट उनके आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किया गया है।

USCIRF द्वारा किये गए ट्वीट के मुताबिक़, कोविड 19 महामारी के इस दौर में ऐसी रिपोर्ट्स आई हैं कि भारत सरकार सीएए का विरोध कर रहे मुस्लिम एक्टिविस्ट को गिरफ़्तार कर रही है. इसमें सफ़ूरा ज़रगर भी हैं, जो गर्भवती हैं. ऐसे समय में भारत को चाहिए कि वो इन्हें रिहा करे, और उन लोगों को निशाना न बनाए।

आपको बता दें 27 साल की सफ़ूरा ज़रगर जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च स्कॉलर हैं. दिल्ली पुलिस ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में शामिल होने को लेकर सफ़ूरा को 10 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था।

गौरतलब है की, विवा’दि’त नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) को लेकर बीते साल दिसंबर में पूरे भारत में प्रदर्शन हुए. जिसमे एक बड़ा समूह मुस्लिम महिलाओं का था. प्रदर्शन कर रहे लोगों का आरोप है कि यह क़ानून कथित तौर पर मुस्लिम विरोधी है।

वही अमरीकी एजेंसी USCIRF ने पिछले महीने प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि साल 2019 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति ख़राब हुई है. वार्षिक रिपोर्ट में भारत को एक ऐसे देश के रूप में परिभाषित करते हुए चिंता ज़ाहिर की गई थी जहां साल 2019 में धार्मिक स्वतंत्रता का क्रमिक उल्लंघन हुआ है।

इसी मुद्दे पर किए गए एक अन्य ट्वीट में आयोग ने दावा किया है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो नकारात्मक ट्रेंड साल 2019 में देखने को मिला था वो साल 2020 में भी जारी है।

वही इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एनआरसी मुस्लिमों के साथ भेदभाव के लिए जानबूझकर किया गया प्रयास है. ग़ौरतलब है कि असम में एनआरसी की अंतिम लिस्ट जारी होने के बाद क़रीब 19 लाख लोगों को इससे बाहर रखा गया था।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एनपीआर को लेकर ऐसी आशंकाएं हैं कि यह क़ानून भारतीय नागरिकता के लिए एक धार्मिक परीक्षण बनाने के प्रयास का हिस्सा है और इससे भारतीय मुसलमानों का व्यापक नुक़सान हो सकता है।

साभार: बीबीसी हिंदी