क्या होती है तब्लीगी जमात, कैसे काम करते हैं जमाती, मरकज़ क्या है? क्यों इकठ्ठा होते हैं हज़ारों मुसलमान

तब्लीगी जमात क्या है [Tablighi jamaat in Hindi] दुनियाभर में कैसे काम करते हैं जमात के लोग, मरकज़ क्या है?

दोस्तों आप लोगों में से शायद कई लोग ऐसे होंगे जिन्होंने ‘तब्लीगी जमात’ का नाम शायद न सुन रखा हो, खासतौर से जो गैर मुस्लि’म लोग हैं, वो इस तबलीगी जमात में बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानते, लेकिन हैरत की बात आपको ये भी बताएं कि ऐसे कई मुस्लि’म लोग भी हैं जो अभी भी तबलीगी जमात की कुछ बातों से अनजान हैं.

दोस्तों कल से जब आपने तबलीगी जमात से जुडी न्यूज़ देखी होगी, तो आपके मन में भी कई सवाल आते होंगे की यह मुसलमानों का ऐसा कैसा संगठन है, और तबलीगी जमात क्या होती है. इसमें हजारों मुसलमानों को क्यों इकट्ठा किया जाता है वगैरा-वगैरा. इसके साथ ही एक बात और कि मरकज़ क्या होता है? यह मरकज नाम की चीज आखिर है क्या?.

  • तबलीगी जमात क्या है
  • कैसे काम करती है तबलीग़ जमात?
  • मरकज़ क्या होता है

तबलीगी जमात क्या है? | What is Tablighi jamaat in Hindi

Tablighi jamaat in Hindi

तबलीगी जमात और मरकज़ में ऐसा क्या है, जहां हजारों मुसलमान इकट्ठा होते हैं?. इसके अलावा तबलीगी जमात के लोग क्या काम करते हैं, इस तरह के सभी सवालों का जवाब जानने के लिए इस पोस्ट को आप आखरी तक जरूर पढ़ें, और अपने दोस्तों तक ज़रूर शेयर करें.

दोस्तों, तबलीगी जमात की स्थापना सबसे पहले 1926-27 में हुयी थी. इस तबलीगी जमात की स्थापना मौलाना इलियास ने की थी. तबलीगी जमात की स्थापना का उद्देश्य था, तबलीगी जमात संगठन के ज़रिये मुस्लिम धर्म के लोगों के बीच अल्लाह और उनके रसूल की बातों को पहुँचाना.

तबलीगी जमात क्या काम करती है

तबलीगी जमात मुस्लि’म समुदाय को सामाजिक बुराइयों से दूर करके उन्हें, इस्लाम धर्म की सही शिक्षा देने का काम करती है. जमात लोगों के बीच जाकर उन्हें इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना और नेक कामों पर अमल करने के लिए समझाइश देने का काम करती है.

तबलीगी जमात क्या काम करती है

ये तबलीग जमात मुस्लि’म समुदाय, खासकर युवाओं को सामाजिक बुराइयों से बचाने तथा उनको इस्लामिक अध्यात्म की तरफ लाने का काम करती है. जिससे उनका और उनके परिवार का बेहतर भविष्य का निर्माण हो सके.

दोस्तों, तबलीगी जमात की शुरुआत ‘हज़रत निजामुद्दीन’ में स्थित मस्जिद में ही हुई थी. हालांकि इसकी शुरुआत काफी बेकार हुई थी, उस समय लोगों में इसके प्रति इतना जागरूकता नहीं थी.

लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया और लोगों को इसकी अच्छाई के बारे में पता चलता गया तब जाकर लोगों में जागरूकता फ़ैली और लोग इससे जुड़ते चले गए. आज तबलीग जमात दुनिया की सबसे बड़ी तंजीम (संगठन) है.

ऐसे शुरू हुआ ‘तबलीग जमात’ का बाहर निकलने का सिलसिला

इस तबलीगी जमात के संगठन ने मुस्लि’म धर्म के लोगों तक अल्लाह के रसूल और दीन की बातों को देशभर समेत, दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुँचाने का मन बनाया. और फिर 1940 में सबसे पहली बार ‘तबलीगी जमात’ को दिल्ली के पास से लगे हुए मेवात के इलाके में इस्लाम और अल्लाह के रसूल की बातों का प्रचार-प्रसार करने के लिए बाहर निकाला गया.

तबलीगी जमात का मतलब क्या है?

सबसे पहले आपको बता दें कि तबलीगी जमात का मतलब क्या होता है. दोस्तों ‘तबलीगी’ शब्द का मतलब होता है अल्लाह की कही हुई बातें, और ‘जमात’ का मतलब होता है एक ग्रुप (समूह). तो इस तरह से तबलीगी जमात शब्द बनता है. अब आप लोगों को अच्छी तरह से समझ आ गया होगा की तबलीगी जमात का मतलब क्या होता है.

मरकज़ किसे कहते हैं, ये क्या होता है?

दोस्तों, मरकज़ का मतलब है जोड़, इसको आसान भाषा में अगर में समझाऊ तो ‘मरकज़’ का मतलब है इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करने वालों के लिए मीटिंग की एक मुख्य जगह.

आपको बता दें कि देश और दुनिया भर में हर शहर में कोई-न कोई मस्जि’द को ‘मरकज़’ की उपाधि दी जाती है. अगर तबलीग़ जमात को कहीं भी जाना होता है, या फिर किसी भी जगह की तबलीग जमात को रुकना होता है तो वो इस मरकज़ में ही रुकते हैं.

आपको बता दें हमारे देश में तबलीग़ जमात का मुख्यालय दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन के बंगले वाली मस्जिद में स्थित है. बाकी सभी छोटे बड़े शहरों की किसी एक ख़ास मस्जिद ओ चुनकर उसे वहां का मरकज़ बना दिया जाता है.

कैसे काम करती है तबलीग़ जमात?

ये जमातें कहीं भी निकलने से पहले उस जगह के मरकज़ में इकठ्ठा होते हैं, फिर एहिं से अलग-अलग शहरों या देश के दूसरे हिस्सों में इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार  के लिए निकलती हैं. एक जमात यानि के (समूह) में लगभग आठ-दस लोग शामिल होते हैं. या इससे ज़्यादा भी हो सकते हैं.

फिर इसके बाद एक-एक करके ये जमातें 1 दिन, 3 दिन और 40 दिन के लिए जगह-जगह इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए निकल जाती हैं. और अपने निर्धारित समय को पूरा करने के बाद वापिस उसी जगह लौटकर मरकज़ में आते हैं. फिर इसके बाद वो अपने-अपने घर को जा सकते हैं.

जमाती को अनुशासन का सख्त पालन करना होता है

इन जमातों में अनुशासन का बड़ा ध्यान रखा जाता है, अगर किसी को पेशाब तक करने जाना होगा तो वो जमात के मुखिया या उसकी अनुपस्तिथि में दूसरे मेम्बरों से इजाज़त लिए बगैर नहीं जा सकता.

जमात में निकलने के बाद, यानि कि उस दौरान अपने घर या और दूसरी दुनियादारी की बातें करने की इजाज़त किसी को भी नहीं होती. सिर्फ और सिर्फ दीन, इस्लाम और अल्लाह के रसूल की बातों का ज़िक्र होता है.

आने जाने के किराय-खर्चे और खाने का इंतेज़ाम भी खुद करना होता है

जमात के लोग अपने शहर से दूसरी जगह आने-जाने वाले खर्चे को खुद उठाते हैं. यहाँ तक के अपने खाने का भी खुद अपने खर्चे पर इंतज़ाम करते हैं. इन्हें किसी संगठन द्वारा पैसा नहीं दिया जाता. हां ये बात अलग है कि अगर शहर के मरकज़ में कोई जमात आकर रूकती है तो कुछ अल्लाह के नेक बन्दे अपनी तरफ से उनको खाने की दावत कर देते हैं.

अगर कोई शख्श जमात की दावत करता है तो उसको जमात को कुछ घंटों पहले इत्तेला देनी होती है, जिससे वो लोग अपने लिए खाना न बनायें. दावत देने वाले शख्श को खाना मरकज़ में पहुँचाना होता है. वो जमात को अपने घर नहीं ले जा सकता.

दिल्ली (नोएडा) के रहने वाले ज़ुबैर शैख़, पिछले 10 वर्षों से भारतीय राजनीती पर स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर कई न्यूज़ पोर्टल और दैनिक अख़बारों के लिए कार्य करते हैं।